उच्च शिक्षा के क्षेत्र में समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किए गए यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने) विनियम, 2026 को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है।
शीर्ष अदालत ने इन नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है और स्पष्ट किया है कि पूरे देश में फिलहाल यूजीसी रेगुलेशन 2012 ही प्रभावी रहेंगे।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने नए नियमों की भाषा, उद्देश्य और प्रभावों पर गंभीर सवाल उठाए।कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यूजीसी रेगुलेशन 2026 की भाषा अस्पष्ट और भ्रम पैदा करने वाली है, जिससे भविष्य में दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
जातिविहीन समाज पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सामाजिक समानता और आरक्षण नीति से जुड़े व्यापक मुद्दों पर भी अपनी राय रखी।उन्होंने कहा कि —
“देश को जातिविहीन समाज की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हम कहीं उल्टी दिशा में तो नहीं जा रहे।”
उन्होंने आगे कहा कि जिन वर्गों को सुरक्षा और संरक्षण की आवश्यकता है, उनके लिए उचित व्यवस्था होनी चाहिए, लेकिन नियमों की भाषा स्पष्ट, न्यायसंगत और संतुलित होनी चाहिए।
केंद्र सरकार को नोटिस, जवाब तलब
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए नए नियमों पर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब तक इस मामले में कोई अंतिम निर्णय नहीं आता, तब तक 2012 के पुराने यूजीसी नियम ही लागू रहेंगे।
19 मार्च को होगी अगली सुनवाई
इस महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को निर्धारित की गई है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह सुनवाई उच्च शिक्षा नीति की दिशा तय करने में निर्णायक साबित हो सकती है।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने अदालत में दलील दी कि यूजीसी रेगुलेशन 2026 संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
उन्होंने कहा कि यह नियम समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन करते हैं और यूजीसी अधिनियम 1956 की भावना के विपरीत हैं।
एडवोकेट जैन के अनुसार,
“ये नियम मनमाने हैं और शिक्षा व्यवस्था में संतुलन बिगाड़ सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश छात्रों और शिक्षण संस्थानों के हित में है।”
23 जनवरी 2026 को नोटिफाई हुए थे नियम
गौरतलब है कि यूजीसी रेगुलेशन 2026 को 23 जनवरी 2026 को आधिकारिक रूप से अधिसूचित किया गया था।
नोटिफिकेशन जारी होते ही देशभर में शिक्षाविदों, छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों ने इसका विरोध शुरू कर दिया था।
आलोचकों का कहना है कि ये नियम —
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मनमाने हैं
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सामाजिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं
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सामान्य वर्ग के साथ भेदभाव को बढ़ावा देते हैं
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संविधान और यूजीसी अधिनियम 1956 के खिलाफ हैं
विशेष समिति गठित करने का संकेत
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि आवश्यक हुआ, तो एक विशेष विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सकता है।
यह समिति यूजीसी रेगुलेशन 2026 की समीक्षा करेगी और नियमों की भाषा को अधिक स्पष्ट, न्यायसंगत और व्यवहारिक बनाने के सुझाव दे सकती है।
उच्च शिक्षा क्षेत्र में बड़ा असर
इस अंतरिम आदेश का देशभर के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, शिक्षकों और छात्रों पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला —
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उच्च शिक्षा नीति की दिशा तय करेगा
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समानता बनाम योग्यता की बहस को नई गति देगा
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भविष्य की आरक्षण और समान अवसर नीतियों को प्रभावित करेगा
आगे क्या होगा?
अब सभी की निगाहें 19 मार्च 2026 की सुनवाई पर टिकी हुई हैं, जहां यह तय होगा कि यूजीसी रेगुलेशन 2026 स्थायी रूप से लागू होंगे या संशोधन के साथ दोबारा पेश किए जाएंगे।
यह मामला न केवल कानूनी रूप से, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।












