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डी.एड. अभ्यर्थियों पर कार्रवाई को लेकर भड़का आक्रोश, सरकार के रवैये पर उठे सवाल

प्रदेश में शिक्षा और रोजगार को लेकर संघर्ष कर रहे युवाओं के साथ जिस तरह का व्यवहार हाल के दिनों में देखने को मिला है, उसने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले दो माह से अपनी जायज मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे डी.एड. अभ्यर्थियों पर भाजपा सरकार द्वारा की गई कार्रवाई को लेकर प्रदेशभर में आक्रोश का माहौल है।    

डी.एड. अभ्यर्थी लंबे समय से अपनी नियुक्ति, रोजगार की गारंटी और भविष्य को सुरक्षित करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। बावजूद इसके, सरकार ने उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनने और समाधान निकालने के बजाय आंदोलन को दबाने का रास्ता चुना। कल जिस प्रकार से प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों पर बल प्रयोग किया गया, वह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के भी खिलाफ है

चुनाव के दौरान भाजपा ने युवाओं को रोजगार, शिक्षा और सम्मान देने के बड़े-बड़े वादे किए थे। लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्हीं युवाओं के शांतिपूर्ण आंदोलन को कुचलने का प्रयास सरकार के दमनकारी रवैये को उजागर करता है। सवाल यह उठता है कि जब युवा अपनी बात शांति से रखने आते हैं, तो उनके साथ संवाद करने की बजाय लाठी और बल का प्रयोग क्यों किया जाता है?

डी.एड. अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं की थी और अपनी मांगों को लोकतांत्रिक तरीके से सरकार तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे थे। इसके बावजूद उनके साथ कठोर व्यवहार किया गया, जिससे युवाओं में गहरी निराशा और आक्रोश व्याप्त है।

प्रदेश का युवा आज यह सवाल पूछ रहा है कि क्या मेहनत, शिक्षा और संघर्ष की यही कीमत है? क्या सरकार के लिए युवाओं की आवाज सुनना इतना मुश्किल हो गया है? अगर पढ़ा-लिखा युवा अपने भविष्य को लेकर सवाल करेगा, तो क्या उसे इसी तरह दबाया जाएगा?

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि भाजपा सरकार युवाओं के मुद्दों को लेकर संवेदनशील नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार दमन की नीति छोड़कर संवाद का रास्ता अपनाए, डी.एड. अभ्यर्थियों की मांगों पर गंभीरता से विचार करे और उन्हें उनका हक दिलाने के लिए ठोस कदम उठाए।

यदि ऐसा नहीं किया गया, तो यह असंतोष आने वाले समय में और भी बड़ा रूप ले सकता है, जिसकी जिम्मेदारी पूरी तरह सरकार की होगी।